श्री श्री 1008 बाबा नकोदर दास जी

श्री 1008 बाबा नकोदर दास जी का जीवन एवं विरासत

भाग 1: जन्म और स्थान

​श्री बाबा नकोदर दास जी का जन्म एक उत्तम ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह पावन स्थान चिन्तपूर्णी से साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी पर तलवाड़ा रोड, धर्मशाला महन्तां में स्थापित है। इस स्थान को आज ‘श्री बाबा नकोदर दास जी’ के नाम से जाना जाता है।

भाग 2: माता-पिता और भक्ति की प्रेरणा

​आपके पिता जी का नाम धर्मदास जी था और माता जी की प्रेरणा से ही आपका मन ईश्वर की भक्ति में लीन हुआ।

​भाग 3: गौ सेवा और ध्यान

​बाबा जी बचपन में जंगलों में गौएं चराया करते थे। ईश्वर की असीम कृपा से उनका मन प्रभु भक्ति में ऐसा रमा कि वे बड़े पेड़ के नीचे बैठकर घंटों ध्यान लगाते थे।

​भाग 4: चमत्कारी गौएं

​उनकी गौएं जंगल में स्वयं चरती रहतीं और पेट भर जाने पर चुपचाप बाबा जी के पास आकर बैठ जाती थीं।

​भाग 5: कठोर तपस्या

​बाबा जी बिना अन्न-जल ग्रहण किए प्रभु भक्ति में लीन रहते थे, जिसे देख उनके माता-पिता अत्यंत चिंतित रहते थे।

​भाग 6: संत बाबा जतिदास जी का आगमन

​उस समय एक महान संत बाबा जतिदास जी का बहुत नाम था। पुत्र की चिंता में व्याकुल माता-पिता उनके पास पहुँचे और उनसे बालक को देखने का अनुरोध किया। बाबा जतिदास जी उनके कहने पर धर्मशाला महन्तां पहुँचे।

​भाग 7: परीक्षा का निश्चय

​बाबा जतिदास जी ने बाबा जी से मिलने के बाद उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया।

​भाग 8: दूध की परीक्षा

​परीक्षा और चमत्कार: बाबा जतिदास जी ने दूध मँगवाया और चुपके से उसमें ढाई दाने चावल को पीसकर डाल दिया। उन्होंने वह दूध बाबा नकोदर दास जी को पीने के लिए दिया।

​भाग 9: महान चमत्कार

​तब बाबा जी ने अपनी उंगली दूध के गिलास में घुमाई और चमत्कारिक रूप से चावल के तीन साबुत दाने निकालकर बाबा जतिदास जी के हाथ पर रख दिए।

​भाग 10: गुरु-शिष्य का मिलन

​यह चमत्कार देखकर जतिदास जी दंग रह गए। वे तुरंत बाबा नकोदर दास जी के चरण स्पर्श करने के लिए बढ़े और कहा— “आप मेरे गुरु हैं!”

​भाग 11: बाबा जी की विनम्रता

​परन्तु नकोदर दास जी ने विनम्रता से उन्हें रोकते हुए कहा कि महात्मा जी, गुरु तो आप ही हैं। गुरु ही शिष्य की परीक्षा लेता है।


​भाग 12: परीक्षा में सफलता

आप भी मेरी परीक्षा लेने आए हो मैं आपकी परीक्षा में सफल हो गया हूँ। अब आज से मेरे गुरु हैं मैंने आज तक कोई गुरु धारण नहीं किया। अतः आपने जो बड़ी कृपा की जो आप मेरे यहां स्वयं आ गए हैं।

​भाग 13: बाबा जी की विनम्रता और विचार

​यह मेरा सौभाग्य है कि आप मेरे पूज्य हैं अतः मैं आप का गुरु नहीं बन सकता। नकोदर दास जी ने उत्तर दिया गुरु के लिए गुण की आवश्यकता है जाति की नहीं। मेरे घर में गंगा आ गई है जो आप स्वयं पधारे है। आज से आप मेरे गुरु हैं।

​भाग 14: गुरु-शिष्य का संकल्प

​और कहाकि बाबा नकोदर दास जी ने बाबा जतिदास जी को कहा आप ने हमारी परीक्षा ली है आजसे आप हमारे गुरु हैं। बाबा जतिदास जी ने बाबा नकोदर दास जी को आशिर्वाद दिया और साथ ही उनके माता पिता को कहा कि ये कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।

​भाग 15: क्षेत्र का कल्याण

​और आज से इस सारे क्षेत्र के लोग इन्हें ही अपना गुरु मानेंगे। यह व्यक्ति इस सारे क्षेत्र का कल्याण करेगा। बाबा नकोदर दास जी ने भी उन्हें अपना गुरु माना और कहा कि उनके पश्चात आने वाली सभी पीढ़ियाँ जो भी इस गद्दी पर गुरु के रूप में विराजमान होगें वो आपके परिवार के वंशज द्वारा ही गुरु रूप में सम्मानित होंगे।

​भाग 16: दीन-दुखियों की सेवा

​बाबा जी ने अपने जीवन काल में दीन-दुखियों की सेवा की और आस पास के समूचे इलाके का उद्धार किया बाबा नकोदर दास जी की तपोःसाधना, और योग शक्ति ने गंगा के जल की धारा को बांध कर यहाँ पहुँचाया है।

​भाग 17: पाप-खण्डन बावड़ी

​आज वह बाबड़ी “पाप-खण्डन” के नाम से प्रसिद्ध है। विविध रोग ग्रस्त व्यक्ति उस तपोभूमि की मिट्टी जहां पर बाबा जी ने तपस्या की है और वावड़ी के जल से स्नान करने पर स्वस्थ होते है।

​भाग 18: ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति

​बाबा जी ने जीवन भर श्री हरि विष्णु जी का ध्यान किया व जिस स्थान को गुफा कहा जाता है वहाँ पर भक्ति मार्ग द्वारा ब्रह्मज्ञान अर्जित किया।

​भाग 19: लोक कल्याणकारी जीवन

​बाबा जी अपनी योग तपस्या से आने वालों की मनोकामना के पूरा होने के कारण बाबा नकोदर दास जी का जीवन समाज कल्याण, दीन-दुःखियों की सेवा और तप साधना में बीतता गया।