श्री श्री 1008 बाबा नकोदर दास जी

हमारे बारे में

माता श्री चिंतपूर्णी जी के पवित्र धाम के निकट, ऊना से लगभग 62 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धर्मशाला महंता एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक मठ है। इसकी स्थापना मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में तपस्वी संत श्री 1008 बाबा नकोदर दास जी द्वारा की गई थी।

श्री 1008 बाबा नकोदर दास जी पंचदेव उपासक थे, किंतु उन्होंने भगवान श्री विष्णु की आराधना को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Wall Paintings of the Western Himalayas में सुश्री मीरा सेठ उल्लेख करती हैं कि वर्तमान महंत के पिता महंत लक्ष्मी धर जी, जिनका कुछ वर्ष पूर्व देहावसान हो गया था, के पास एक सनद (शाही अनुदान पत्र) सुरक्षित थी। माना जाता है कि यह सनद उनके पूर्वजों को मुगल सम्राट औरंगज़ेब द्वारा उनके शासनकाल के नौवें वर्ष, अर्थात 1667 ईस्वी में प्रदान की गई थी।

माता श्री चिंतपूर्णी जी के दर्शन हेतु आने वाले हजारों श्रद्धालु धर्मशाला महंता में भी श्रद्धापूर्वक दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ धर्मशाला महंता अपनी अद्भुत भित्ति चित्रकला (Wall Paintings) के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मठ परिसर में दो प्रमुख भवन स्थित हैं, जिनकी चित्रकला शैली एक-दूसरे से भिन्न है।

सबसे प्राचीन एवं उत्कृष्ट भित्ति चित्र उस भवन की बैठक में देखने को मिलते हैं, जिसका आकार लगभग 6 मीटर × 4.75 मीटर है। महंत लक्ष्मी धर जी के अनुसार इन चित्रों का निर्माण उनके दादा जी के समय एक कुशल मिस्त्री (राजमिस्त्री) द्वारा कराया गया था। इससे अनुमान लगाया जाता है कि इनका निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में हुआ था।

समय के प्रभाव से इन चित्रों का एक बड़ा भाग क्षतिग्रस्त हो चुका है, फिर भी जो चित्र आज भी सुरक्षित हैं, वे अपनी कलात्मक सुंदरता, सौम्यता और ऐतिहासिक महत्ता के कारण दर्शकों को आकर्षित करते हैं।

मठ परिसर के दूसरे भवन में एक छोटा मंदिर स्थित है, जिसकी दीवारों पर भी सुंदर भित्ति चित्र अंकित हैं। इन चित्रों में लोक कला की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। यद्यपि ये चित्र अपनी विशिष्ट शैली के कारण महत्वपूर्ण हैं, फिर भी बैठक के भित्ति चित्रों की कलात्मक उत्कृष्टता और सौंदर्य की तुलना में ये अपेक्षाकृत सरल प्रतीत होते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि इनका निर्माण बाद के समय में हुआ होगा।

कला प्रेमी, इतिहासकार तथा सामान्य दर्शक जब धर्मशाला महंता की इन दुर्लभ भित्ति चित्रों का अवलोकन करते हैं, तो उन्हें भारत की समृद्ध सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत का सजीव दर्शन होता है। दुर्भाग्यवश, समय के साथ इन चित्रों की रंगत और चमक धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। यदि इनके संरक्षण और संवर्धन के लिए समय रहते प्रभावी प्रयास नहीं किए गए, तो भविष्य में यह अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर लुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

धर्मशाला महंता केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, कला और आध्यात्मिक परंपरा का एक अमूल्य संगम है, जो आज भी श्रद्धालुओं, शोधकर्ताओं, इतिहासकारों तथा कला प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

गुरु परंपरा (हमारे गुरूजन)

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श्री श्री 1008 बाबा नकोदर दास जी

श्री बाबा नकोदर दास जी का जन्म एक उत्तम ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह पावन स्थान चिन्तपूर्णी से साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी पर तलवाड़ा रोड, धर्मशाला महन्तां में स्थापित है। इस स्थान को आज 'श्री बाबा नकोदर दास जी' के नाम से जाना जाता है।

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श्री बाबा अभयराम जी

बाबा नकोदर दास जी के ब्रह्मलीन होने के पश्चात उनके पुत्र बाबा अभय राम जी ने गद्दी का कार्यभार संभाला और बाबा नकोदर दास जी के पदचिह्नों पर चलते हुए अपना जीवन मानवता के सेवा में व्यतीत कर दिया।

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श्री बाबा हरीराम जी

बाबा अभयराम जी ने अपने जीवन में मानवीय मूल्यों की स्थापना की और गद्दी के मूल सिद्धान्त धर्म की पवित्रता और मानवता की सेवा को पूर्णतः अपने जीवन में समाहित किया। इसी परम्परा का पालन बाबा हरीराम जी ने अपने जीवन काल में गद्दी की सेवा करने में समर्पित कर दिया।

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श्री बाबा हरिनारायण जी

बाबा हरिनारायण जी ने भी बाबा नकोदर दास जी मूल सिद्धान्तों का अनुसरण करते हुए अपना जीवन भी मानवता की सेवा लगा दिया। जो भी व्यक्ति उनके पास आता उसे वह उचित सेवा व आशीर्वाद देकर समृद्धि कर देते और इस प्रकार हर व्यक्ति उनके प्रभाव से खाली हाथ नहीं जाता था।

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श्री बाबा झुंजा जी

बाबा झुंजा राम जी घुमन्तू स्वभाव के व्यक्ति थे। जहां जिसने बुलाया, सम्मान से बुलाया उसके यहां अवश्य पधारते। वहलखण नामक गांव में एक बुजुर्ग व्यक्ति बाबा जी को अपने गांव में बुलाकर बहुत आदर सत्कार करते थे और कहते कि आप इधर आएं तो हमारे यहाँ अवश्य दर्शन दें।

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श्री बाबा कलाधारी जी

बाबा कलाधारी जी कला निपुण प्रभावशाली व्यक्ति थे। जब गद्दी का कार्य भार अपने कन्धों पर आ गया तो तपोभूमि की देखरेख का कार्यभार अपनी पत्नी ठाकुरी देवी के कन्धों पर डाल कर धार्मिक प्रचार के लिए निकल गए। जैसा कि सुना गया है, गांव, गांव में पैदल चलकर होशियारपुर, जालन्धर से होते हुए अमृतसर लाहीर नगरों और गाँवों में दूर-दूर तक घूम कर धार्मिक प्रचार किया।

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श्री ​बाबा झगड़राम जी

बाबा झगड़राम जी ने अपने जीवन में मानवीय मूल्यों की स्थापनाओं की और गद्दी के मूल सिद्धांत धर्म की पवित्रता और मानवता की सेवा को पुण्यतः अपने जीवन में समाहित किया। इसी परम्परा का पालन बाबा झगड़राम जी ने अपने जीवन काल में गद्दी की सेवा करने में समर्पित कर दिया।

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श्री बाबा श्रद्धाराम जी

बाबा श्रद्धाराम जी ने अपने जीवन में मानवीय मूल्यों की स्थापना की और गद्दी के मूल सिद्धांत धर्म की पवित्रता और मानवता की सेवा को पुण्यतः अपने जीवन में समाहित किया। इसी परम्परा का पालन बाबा श्रद्धाराम जी ने अपने जीवन काल में गद्दी की सेवा करने में समर्पित कर दिया।

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श्री बाबा ठाकुर दास जी

होनहार विरवान के होत चीकने पात" कवि के अनुसार बाबा श्रद्धाराम जी के बेटे श्री ठाकुर दास भी बचपन से ही तीक्षण बुद्धि के थे। उन्हें शिक्षा के लिए विद्वानों को बुलाकर कर घर पर ही शिक्षा का प्रबन्ध किया गया धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, हिन्दी संस्कृत के ज्ञान के साथ-साथ उर्दू की पढाई की व्यवस्था भी की गई।

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श्री बाबा कृष्ण देव जी

बाबा कृष्णदेव जी ने अपने जीवन में मानवीय मूल्यों की स्थापना की और गद्दी के मूल सिद्धांत धर्म की पवित्रता और मानवता की सेवा को पुण्यतः अपने जीवन में समाहित किया। इसी परम्परा का पालन बाबा कृष्ण देव जी ने अपने जीवन काल में गद्दी की सेवा करने में समर्पित कर दिया।

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श्री बाबा लक्ष्मीधर जी

बाबा लक्ष्मीधर जी ने 13 वर्ष की अल्पायु से गद्दी का कार्यभार संभाला। पिता कृष्णदेव स्वयं हिन्दी संस्कृत के विद्वान थे और शास्त्रों में रुचि रखते थे। उन्होंने पाठशाला में हिन्दी संस्कृत पढ़ाने के लिए विद्वान अध्यापक रखे और दूर-दूर से आकर पढ़ने वाले विद्यार्थियों के ठहरने की व्यवस्था के अतिरिक्त दोनों समय भोजन लंगर में खाने की व्यवस्था की थी।

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श्री बाबा श्रीशचन्द्र जी

अपने पिता बाबा लक्ष्मीधर जी की मृत्यु पश्चात बाबा श्रीशचन्द्र जी B.A. LL.B जी ने पढ़ाई पूर्ण कर गद्दी का कार्यभार संभाला वर्ष 1995 से सरल व्यक्तित्व के स्वामी बाबा श्रीशचन्द्र जी ने अपना जीवन अपने पिता और अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित मूल्यों को समर्पित कर गद्दी का चहुमुखी विकास पर समर्पित कर दी।

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श्री गुरु उपेन्दर पराशर जी

जैसे पूर्व गुरुओं ने अपने तप, त्याग और आशीर्वाद से इस पावन परंपरा को आगे बढ़ाया, वैसे ही आज के गुरु जी श्री गुरु उपेंद्र पराशर जी उसी परंपरा के जीवंत स्वरूप बनकर भक्तों के जीवन में नई दिशा और शक्ति का संचार कर रहे हैं।