बाबा झुंजा राम जी घुमन्तू स्वभाव के व्यक्ति थे। जहां जिसने बुलाया, सम्मान से बुलाया उसके यहां अवश्य पधारते। वहलखण नामक गांव में एक बुजुर्ग व्यक्ति बाबा जी को अपने गांव में बुलाकर बहुत आदर सत्कार करते थे और कहते कि आप इधर आएं तो हमारे यहाँ अवश्य दर्शन दें। एक बार बाबा जी अपने घुमन्तु स्वभाव से जाते-जाते गांव में सीधे उस घर में पहुँचे और ‘जय राम जी’ स्वभावतः जयकार बुलाया। घर के मालिक वही बुजुर्ग काफी बीमार थे, उठ नहीं सके।
घर के सब लोग काम से गए होंगे। उधर उस कमरे में ही बच्चे खेल रहे थे। बुजुर्ग उठने में और जोर से बोलने में भी असमर्थ थे। उन्होंने बच्चों को कहा- देखो बाहर बाबा झुंजा राम जी की आवाज़ सुनाई दे रही है। उन्हें बैठने को आसन दो। हाथ पैर धुलाओ और जलपान कराओ। फिर मेरे साथ मिला दो। जाओ, देखो झुंजा राम जी आए हैं। बच्चे कमरे से बाहर आए, देखा मोटा भारी भरकम शरीर लम्बी दाढ़ी, सफेद वेष भूषा, बगल में झोली, बाबा की इस भेष भूषा को देखकर अबोध बच्चे बैठने के लिए कहना तो भूल गए और एकदम जोर से ताली बजाते हुए हंसते-हंसते कहने लगे “झुंजा ओए, झुंजा ओ” कहते-कहते ताली बजाते हंसते-हंसते नाचने लगे। बाबा ने सोचा घर में अकेले बच्चे हैं अनजान है मुझे पहचाना नहीं घर में अनजान बच्चे अकेले होंगे ऐसा विचार कर घर के आंगन से वापिस चल पड़े। अब उन बच्चों की आवाज़ सुनकर साथ के घर के बच्चे भी निकल आए।
बाल स्वभाव से उन्हें शरारत सूझी ओए झुंजा ओ झुंजा ओ झुंजा कहते-कहते ताली बजाते पीछे-पीछे चल पड़े तो बाबा जी किसी घर में न जाकर सीधे रास्ते में चल पड़े। अब दूसरे घरों के बच्चे भी निकल कर झुंजा-झुंजा कहते चल रहे थे। एक के बाद एक बच्चों का झुण्ड बन गया और अब झुंजा के स्थान पर “हूँजा ओए हूँजा ओए” कहते-कहते मिट्टी, ढेला, पत्थर उन पर फेंकने लगे।
उन्होंने बच्चों को रोकना भी चाहा पर बाल स्वभाव और शरारत का माहौल बच्चे कहां मानते। अब ढेले और पत्थर उन्हें आकर लगे। वे तेज कदम बढ़ाते-बढ़ाते अब दौड़ने भी लगे। भारी भरकम शरीर से दौड़ते देख उसके लिए तमाशा बन गया पर ग्रह के मारे पूरे गांव में किसी ने बच्चों की शरारत पर ध्यान नहीं दिया और बच्चे पीछे-पीछे दौड़ते “झुंजा ओ” झुंजा ओ, कहते-कहते गांव के बाहर तक पहुंच गए। जब बच्चों ने दूर तक भी पीछा नहीं छोड़ा तो बाबा तो हांपते हुए मुख से निकला कि “जाओ हूंजा फिर जाए” इस घटना के समय गांव के लोग अपने काम-काम में व्यस्त होंगे। सायं काल का समय था। इस घटना को न किसी ने देखा न सुना और बच्चों के शोर की ओर भी किसी का ध्यान नहीं आया। अब भागते-भागते बच्चों से थोड़ी दूरी हो गई थी और उधर झाड़ियों का झुरमुट था। बाबा भी रास्ता छोड़कर झाड़ियों में छुप गए और आराम की सांस ली। आगे बाबा जी को रास्ते में न देखकर बच्चे हंसते खेलते अपने घरों को चले गए।
अब ईश्वर की माया देखिए – गांव के लोग सांय हो रही थी अपने अपने काम में लगे थे पशुओं से दूध दूहने लगे। कई पशुओं ने दूध नहीं दिया, कुछ पशुओं ने आधा, चौथाई दूध ही दिया। घरों में बच्चों को उल्टियां दस्त, बुखार, बड़े-बूढ़ों की भी यही दशा हुई। कोई गाँव का घर ऐसा नहीं रहा जिस घर के एक दो बीमार न पड़े हों।
अपने घर की दशा थी देखना कठिन था। पशुओं की ओर तो क्या ध्यान जाता। उन दिनों घरेलू इलाज़ काढ़ा, दोशांदा आदि घरेलू उपचार के साधन थे। पर सब बेकार हो गए। बूढ़े के घर की तो यह दिशा कि कोई पानी पिलाने वाला भी न था। सब के बुरे हाल। तब उस बीमार बूढ़े ने घर में पूछा कि घर में बाबा झुंजाराम आए थे? उनको किसी ने बिठाया था? आदर सत्कार किया था या नहीं। बच्चों से पूछा तो अचानक उल्टी-दस्तों से बेहाल बच्चों ने बताया कि सब बच्चे हूंजा-हूँजा कहते दूर तक पत्थर-ढेले मारते भगाकर ले गए थे। अब बूढ़े ने गांव के लोग बुलाए और जो दौड़ धूप कर सकते थे उन्हें बाबा को खोजने को कहा कि बाबा का निरादर करने का यह फल है। बच्चों ने हूंजा हूंजा कहकर मजाक किया। अब सारा गाँव उस की सजा भोगे। हूंजा झुंजा फिरता सामने दिखाई दे रहा है। बच्चें बूढ़े, युवक, स्त्री, पशु सब बीमार हैं। अचानक इस गाँव पर महामारी का प्रकोप कैसे आ गया। आप बाबा को ढूढ़ो। साथ के गाँवों में
पता करो। लोग चारों ओर भागे पर किसी गाँव में कोई पता नहीं चला। निराश वापिस आ गए। सारे गाँव ने रोते, चिल्लाते, बिलखते, तड़फते रात बिताई। बाबा झुंजा दौड़ने से थके सांय काल का समय मान कर उन झाड़ियों में ही चादर के सहारे सो कर रात बिताई सवेरे उठकर आगे बढ़ गए पानी पीकर अपना सवेरे का नियम निभाया और स्नान ध्यान कर आगे गाँव की ओर बढ़ गए।
अब आगे के गाँव में जब पहुंचे तो गाँव वालों ने बाबा जी को देखकर कहा – कि बाबा जी आप को वहलखण गाँव के लोग रात ढूंढ रहे थे। सारा गाँव पशुओं सहित बीमार हो गया है। तब बाबा झुंजा राम ने कहा “फिर गया न हूंजा, अब क्या करे झुंजा” कहते-कहते आगे बढ़ चले। उधर रात बूढ़े बीमार के कहने पर और बच्चों द्वारा बाबा की हंसी उड़ाने की बात को जान कर सब को विश्वास हो गया था कि बाबा के अपमान का यह फल है। सबेरे फिर चारों ओर ढूंढने निकले तो रास्ते में लोगों ने बताया कि बाबा को हम ने रास्ते में जाते देखा है।
वे लोग भागे और बाबा को ढूंढ कर उन के पैरों पर गिर पड़े और बच्चों के अपराध की क्षमा मांगने लगे तब बाबा ने कहा – “मुझे मान अपमान से कोई मतलब नहीं है पर तुम्हारे गाँव के बच्चे गाँव का हूंजा (झाडू फेरना) चाहते थे तो मैं क्या करूं?” पर उन के क्षमा मांगने पर दयालु फक्कर बाबा ने “बाबा नकोदर दास जी की पावन तपस्थल की विभूतिमय मिट्टी देकर कहा कि कुएँ का ताजा जल का लोटा भरो उस में यह “रीण” विभूति डाल दो।
गाँव के सब लोग एक एक ताजा जल का लोटा भर कर उसमें पहले लोटे का थोड़ा-थोड़ा पानी डाल दो और उसे भरकर अपने घर में चारों ओर पानी छिड़को। बीमारों को दो तीन तीन चुल्लू पिला दो पशुओं पर और पशुशाला में भी छिड़को। बाबा नकोदर दास जी का ध्यान कर के नमस्कार करो वे अवश्य कृपा करेंगे। उस पानी के पिलाने और छिड़काने से पशुओं ने दूध दे दिया और एक दो दिन में सारा गांव पहले के समान स्वस्थ हो गया। बूढ़े को भी बीमारी में काफी आराम हो गया। बाबा नकोदर दास जी के तप के प्रभाव से बाबा झुंजा राम जी का मान सम्मान और भी बढ़ गया। बाबा झुंजा जी ने भी बाबा नकोदर दास जी मूल सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए अपना जीवन भी मानवता की सेवा लगा दिया।