श्री बाबा लक्ष्मीधर जी

श्री बाबा लक्ष्मीधर जी का जीवन एवं विरासत

बाबा लक्ष्मीधर जी ने 13 वर्ष की अल्पायु से गद्दी का कार्यभार संभाला। पिता कृष्णदेव स्वयं हिन्दी संस्कृत के विद्वान थे और शास्त्रों में रुचि रखते थे। उन्होंने पाठशाला में हिन्दी संस्कृत पढ़ाने के लिए विद्वान अध्यापक रखे और दूर-दूर से आकर पढ़ने वाले विद्यार्थियों के ठहरने की व्यवस्था के अतिरिक्त दोनों समय भोजन लंगर में खाने की व्यवस्था की थी।

श्री लक्ष्मीधर जी ने एक वर्ष में दो दो कक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं और सातवें वर्ष में चतुर्थ श्रेणी उत्तीर्ण करने के उपरान्त यज्ञोपवीत का मुहूर्त निकलवा कर महान विद्वान् पूज्य वर भगवान दास जी से दीक्षा दिलवा दी। उन्होंने एक वर्ष तपस्वी की भांति शास्त्र आदि की शिक्षा ग्रहण की। पूज्यपाद श्री भगवान दास, जिन्होंने गुरु दीक्षा दी थी, वे संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। व्याकरण, धर्मशास्त्र, साहित्य आदि सब विषय उन्हें कंठस्थ थे। महन्त कृष्णदेव जी ने उन्हें बेटे लक्ष्मीधर जी को घर में पढ़ाने के लिए साग्रह निवेदन किया जिसे पं० जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। क्योंकि गुरु भी अपने शिष्य लक्ष्मीधर जी को परख चुके थे कि उन की तीक्ष्ण वृद्धि और स्मरण शक्ति इतनी तेज थी कि जो बात एक बार पढ़ सुन ली हो वह उन्हें कभी नहीं भूलती थी।

गुरु शिष्य दोनों ही अपने-अपने नित्य नियम से निवृत्त होकर बैठ जाते और एकाग्रमन से अध्ययन करवाते। गुरु जी द्वारा पढ़ाए पाठ में से कभी प्रश्न किया तो ​जैसे पढ़ाया था अक्षरशः उस ही प्रकार सुना देते थे। भगवान दास जी के साथ साथ पुलस्त्य राम शास्त्री जी को भी पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया था। इस प्रकार प्राज्ञ, विशारद, शास्त्री की पढ़ाई जो कम से कम छः वर्ष में पूरी हो सकती थी। क्रमशः योग्यांक लेकर उत्तीर्ण होते हुए उसे चार वर्ष में उत्तीर्ण कर ली। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात कई विद्यार्थियों को संस्कृत की शिक्षा प्रदान की।

​महन्त जी ने अपने कार्य काल के आरम्भ में कलयुग के प्रभाव से प्रभावित लोगों को सही मार्ग दर्शन हेतु प्रत्येक रविवार को धर्मसाल में सत्संग का आयोजन किया था। जिसमें भजन, कीर्तन करवाने वाले, योग्य धार्मिक प्रवक्ता, विद्वानों साधु महात्माओं को बुलाकर समाज सुधार और धार्मिक प्रचार प्रसार किया। स्वयं भी भिन्न-भिन्न विषयों पर प्रवचन करते। शास्त्रों की विविध बातों और उनकी गहराइयों को सरल ढंग से समझाते थे। कई वर्षों तक यह सत्संग चलता रहा है और दूर-दूर से सैंकड़ों ही नहीं हजारों की संख्या लोग सत्संग का लाभ उठाते थे।

​संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान बाबा लक्ष्मीधर जी को वाक्सिद्धि भी प्राप्त थी जिसका उन्होंने हमेशा मानव कल्याण हेतु ही उपयोग किया। उन्होंने नई पीढ़ी को जीवन के मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देने का मूल मंत्र सिखाया और सदा ही बुराईयों से दूर रहने के लिए समाज में निरंतर प्रयत्न करते रहे। आपने पूर्वजों द्वारा स्थापित परंपराओं का पालन बाबा लक्ष्मीधर जी ने पूरी निष्ठा से किया और अपने समस्त शिष्यों को जीवन की सही राह पर चलने का मार्गदर्शन दिया।