“होनहार विरवान के होत चीकने पात” कवि के अनुसार बाबा श्रद्धाराम जी के बेटे श्री ठाकुर दास भी बचपन से ही तीक्षण बुद्धि के थे। उन्हें शिक्षा के लिए विद्वानों को बुलाकर कर घर पर ही शिक्षा का प्रबन्ध किया गया धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, हिन्दी संस्कृत के ज्ञान के साथ-साथ उर्दू की पढाई की व्यवस्था भी की गई। कुछ ही वर्षों में बड़े गूढ़ विषयों पर भी गम्भीरता पूर्वक अपने विचार प्रकट करते थे। अपने पिता श्रद्धा राम जी के भाद्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या कुशोत्पाटनी दिवस में अकाल काल ग्रसित होने पर एकाएक इतना बड़ा बोझ उनके ऊपर आ गया उन्होंने गद्दी की बागडोर सम्भालते ही धर्म साल को एक नया रूप देने का निश्चय किया।
कुछ ही दिनों में धर्मसाल महन्तां का नक्शा ही बदल गया। हिन्दी संस्कृत शिक्षा के लिए पाठशाला, खोली। अब धर्मसाल महन्तां हर प्रकार से सम्पन्न बन गई। लोह लंगर नामक जंगल से बुलान करवा कर ईंट नुमा पत्थर मंगवा कर तपोभूमि गुफा और गद्दी की मरम्मत करवाकर, नए भवन बनवाकर श्री ठाकुर दास जी ने गद्दी पर बैठने से पूर्व गांव का सारा ढांचा ही बदल दिया। आस पड़ोस के गांवों के लिए धर्मसाल अब व्यापार का केन्द्र भी बन गया। हर प्रकार का काम करने वाले कारीगर यहां उपलब्ध थे। धर्मसाल बाजार के नाम से प्रसिद्ध हो गया। लंगर भवन का विस्तार कर दिया। श्रद्धालु सेवकों के ठहरने के लिए नए-नए कमरों और नए भवनों का निर्माण कर दिया। श्री ठाकुर दास जी के गद्दी पर बैठने का उत्सव भी अपने समय का एक उदाहरण था। लगभग पचास वर्ष की आयु तक गद्दी की व्यवस्था कर के बाबा नकोदरदास जी के तप प्रताप के चार चांद लगा दिये।
बाबा ठाकुर दास जी ने अपने जीवन में मानवीय मूल्यों की स्थापना की और गद्दी के मूल सिद्धांत धर्म की पवित्रता और मानवता की सेवा को पुण्यतः अपने जीवन में समाहित किया। इसी परम्परा का पालन बाबा ठाकुर दास जी ने अपने जीवन काल में गद्दी की सेवा करने में समर्पित कर दिया।